देखो शंकर भोलो भालो (तर्ज: आजा आजा रे साँवरिया)


तर्ज: आजा आजा रे साँवरिया


देखो शंकर भोळो भाळो
दर्शण करणे गोकुल चाल्यो
दरश कराय द्यो
ओ नंद के लाल को
देखो शंकर भोळो भाळो...

द्वारे आकर भोलो बाबो
डम-डम डमरू बजायो
द्वार खोल दे ओ बड़-भागण
जोगीड़ो एक आयो
मैं तो बड़ी दूर स्यूँ चाल्यो
आयो देखण न थारो लालो
दरश कराय...

बाहर निकली जोगी देखा
शीश सुधाकर वाला
अंग बभूति और बाघम्बर
गल बिच उरग विशाला
तू तो है कोई जादूगारो
थाने देख डरे म्हारो लालो
दरश कराय...

शिवशंकर न बात सुणी तो
समझावे मृदु बानी
दरश कराद्यो लाल का थे
सुनो यशोदा रानी
म तो जोगी भोलो भालो
ना मैं जादू टोना वालो
दरश कराय...

मात यशोदा मन म ठानी
ना दिखलाऊँ लाला
पशुपति तब बोल उठे हैं
पड़ा हठी से पाला
म तो छोडूँ थारो द्वारो
देखूँ जद म थारो लालो
दरश कराय...

हठ देखा जब त्रिभुवन स्वामी
रुदन करे अति भारी
हार गये सब चुप न होवे
सोच रही महतारी
माता री मति न फेरी लालो
म्हान जोगी कन ले चालो
दरश कराय...

मात यशोदा ल्याई लाल न
दी जोगी री गोद
गोद पालकी प्रभु भये पुलकित
महादेव मन मोद
'शोभा' खड़ी है खोलो द्वारो
तू तो जगत पिता रखवालो
दरशण पायग्यो...

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