कृष्ण कान्हा को बना लो (तर्ज: मेरे मितवा मेरे मीत रे)


तर्ज: मेरे मितवा मेरे मीत रे


कृष्ण कान्हा को बना लो अपना मीत रे
ये निभाएगा सबकी प्रीत रे

प्यार है भक्तों से, दया के हैं सागर
आँखों से करुणा बरसे, कृपा की हैं गागर
इसको मना ले, अपना बना ले
जीवन जाएगा जीत रे

भक्तों से इक पल भी दूर नहीं हैं
जैसे कृष्ण बिना, सूर नहीं हैं
सूर ने ध्याया, कृष्ण को पाया
भूले गर्मी-शीत रे

इक बार ध्याओगे, सौ बार आएगा
सरगम की ताल पे बंशी बजाएगा
तुझको झुमाएगा, तेरे संग गायेगा
जीवन बन जाए गीत रे

तेरे ही चरणों में शीश है झुकाना
'शोभा' कहे कहीं और नहीं जाना
रोम-रोम में भाव में जगा लो
जाए उमरिया बीत रे

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